Thursday, November 15, 2007

मल्लिका-ए-ब्लॉगिंग



चीन की एक ब्लॉगर हैं शू जिंगलाइ. उन्हें ब्लॉगिंग की दुनिया की मल्लिका कहा जाता है. इसलिए नहीं कि वह एक ख़ूबसूरत अभिनेत्री हैं. बल्कि इसलिए कि उनकी वेब डायरी से ब्लॉगिंग को एक नई पहचान मिली है.शू जिंगलाई चीनी भाषा में ब्लॉग लिखती हैं. इतनी नियमितता से कि रोज़ कम-से-कम एक पोस्ट तो लिख ही डालती हैं.शू जिंगलाइ (Xu Jinglei) बहुमुखी प्रतिभा की धनी हैं. वह मात्र 33 साल की हैं लेकिन अपने अभिनय, गायन, फ़िल्म निर्देशन और अब ब्लॉगिंग के ज़रिए लाखों चीनी युवाओं के दिलों पर राज करती हैं.ब्लॉगिंग जगत में शू जिंगलाइ का नाम इसलिए भी बड़े ही अदब से लिया जाता है कि उनका ब्लॉग कुल 10 करोड़ पेज व्यू वाला पहला ब्लॉग बना. अभी ये पोस्ट लिखते समय मैंने देखा तो ये संख्या 10,48,66,693 है, यानि साढ़े दस करोड़ का आँकड़ा ज़्यादा दूर नहीं. और ये सब हुआ है मात्र पौने दो साल में क्योंकि शू ने ब्लॉगिंग की दुनिया में अक्तूबर 2005 में क़दम रखा था.शू जिंगलाइ एक साफ़-सुथरी छवि वाली प्रतिष्ठित स्टार हैं. सरल भाषा में बेबाकी से लिखती हैं. एक पाठक के रूप में उनसे सहजता से जुड़ा जा सकता है. शायद इसलिए उनके एक-एक पोस्ट पर हज़ार-हज़ार टिप्पणियाँ जमा हो जाना आम बात है. ताज़ा उदाहरण दूँ तो 22 जुलाई के उनके पोस्ट पर 1261 टिप्पणियाँ आई हैं. इस पोस्ट के शीर्षक का हिंदी अनुवाद होगा- 'नहीं है बोधि वृक्ष'. इसमें बीजिंग स्थित इस स्टार ने ग्वांगझाओ और हांगकांग की अपनी यात्रा का ब्यौरा दिया है. छोटे-से इस पोस्ट में शू ने यात्रा के दौरान एक फ़िल्म देखने का ज़िक्र किया है. उस फ़िल्म पर अपनी बेबाक राय दी है. और अपनी एक बात को बलपूर्वक कहने के लिए उन्होंने एक भारतीय लोककथा का उल्लेख किया है, कि कैसे एक बाप-बेटे की जोड़ी को साथ में गधा होने के बाद भी पैदल चलना पड़ा.शू जिंगलाइ का ब्लॉग इतना क्यों पढ़ा जाता है? क्यों इतने सारे लोग उनके विचारों पर अपनी राय व्यक्त करते हैं? इन सवालों के जवाब में शू ने इस सप्ताह एक अंग्रेज़ी अख़बार से कहा- "मुझसे अक्सर ये सवाल किया जाता है. और मेरा एक ही जवाब होता है कि लोग मुझे कुल मिलाकर एक सफल व्यक्ति मानते हैं. मैं सर्वाधिक प्रसिद्ध अभिनेत्री नहीं हूँ, सबसे लोकप्रिय फ़िल्म निर्देशक भी नहीं हूँ, न ही सबसे बढ़िया लेखिका हूँ. लेकिन यदि सारी ख़ूबियों को जोड़ा जाए तो मैं ठीकठाक हूँ. एक और बात है कि मैंने बाक़ी के स्टारों से पहले ब्लॉगिंग शुरू कर दी थी."शू ने आगे कहा, "मैं किसी गंभीर मुद्दे पर नहीं लिखती. आम जीवन की छोटी-छोटी बातों पर लिखती हूँ. इसलिए इतने सारे लोग मुझे पढ़ेंगे इसकी मुझे उम्मीद नहीं थी. हो सकता है पाठक एक अभिनेत्री के दिन-प्रतिदिन की ज़िंदगी के बारे जानने की जिज्ञासा रखते हों."अनेक चीनी विश्लेषकों का मानना है कि आम आदमी शू जिंगलाई से ख़ुद को जोड़ कर देखते हैं. इसके अलावा उनके ब्लॉग के चर्चित होने के बाद हज़ारों पाठक यों ही देखादेखी में जुड़ गए. शू अपने बारे में लिखती हैं, अपनी पसंद-नापसंद का ज़िक्र करती हैं, अपनी फ़िल्मों के बारे में लिखती हैं, अपनी यात्राओं का ब्यौरा देती हैं, खाना पकाने से जुड़े अनुभवों को बाँटती है...और अपनी पालतू बिल्लियों की चर्चा भी नियमित रूप से करती हैं.टेक्नोराती की मानें तो शू जिंगलाई के ब्लॉग को ही पिछले साल सबसे ज़्यादा हिट मिला था. और इस महीने 12 जुलाई को उनके ब्लॉग ने 10 करोड़ पेज व्यू का रिकॉर्ड बनाया और इस दृष्टि से ब्लॉगिंग का नंबर वन साइट माने जाने वाले बोइंगबोइंग को भी पीछे छोड़ दिया.शू जिंगलाई के बारे में लिखते हुए बार-बार यही ध्यान में आता रहा कि हिंदी के किसी ब्लॉग को शू के ब्लॉग जैसी सफलता मिलने में अभी कितने साल और लगेंगे? कोई बड़ा सिनेस्टार या क्रिकेटर हिंदी में ब्लॉग लिखना शुरू करे तो शायद कुछ बात बने. लेकिन इसकी भी संभावना कम ही नज़र आती है. वैसे भी, किसी भारतीय स्टार से शू जिंगलाई जैसे नियमित लेखन की कल्पना तक नहीं की जा सकती है. अभिनेता आमिर ख़ान ने पिछले दिनों अपनी फ़िल्म लगान की डीवीडी के प्रचार के हिस्से के तौर पर अंग्रेज़ी में एक ब्लॉग शुरू किया है, सैंकड़ो टिप्पणियाँ भी बटोर रहे हैं. उल्लेखनीय है कि आमिर ने पहली बार मंगल पांडे की रिलीज़ के दौरान कुछ दिनों तक ब्लॉगिंग की थी, और दोबारा लिखने के लिए उन्हें लगान की डीवीडी भारतीय बाज़ार में उतारे जाने का इंतज़ार करना पड़ा. आमिर स्टार हैं, बहुत ही लोकप्रिय हैं, साफ़गोई है उनमें, बाक़ियों के मुक़ाबले बेहद ईमानदार भी हैं...क्या ही अच्छा होता, वे लगातार ब्लॉगिंग करते...अंग्रेज़ी के साथ-साथ हिंदी में भी!!

Monday, November 12, 2007

तूतनख़ामेन का चेहरा दुनिया के सामने

प्राचीन मिस्त्र के सबसे चर्चित राजा तूतनख़ामेन की मृत्यु के लगभग तीन हज़ार वर्षों बाद उनके चेहरे को पहली बार सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए रखा गया है.
पुरातत्ववेत्ताओं ने मिस्र के 'वैली ऑफ़ किंग' में स्थित राजा तूतनख़ामेन की ममी को बाहर निकाल कर उसे विशेष रूप से बनाए गए खाँचे में रखा है.
आज से 85 वर्ष पूर्व ब्रितानी पुरातत्ववेत्ता हॉवर्ड कार्टर ने फ़राओ के इस ममी की खोज की थी. प्राचीन मिस्र के राजाओं को फ़राओ कहा जाता था.
अब तक सिर्फ़ 50 लोगों ने तूतनख़ामेन के चेहरे को देखा है. इस ममी को एक ताबूत में रखा गया था और जब इस प्राचीन शासक के शरीर को इससे बाहर निकाला गया तो झुर्रीधारी काला चेहरा सामने था.
तूतनख़ामेन ने मिस्र पर 1333 ईसापूर्व से लेकर 1354 ईसापूर्व तक शासन किया और सिर्फ़ 19 वर्ष की उम्र में उनकी मृत्यु हो गई.
पुरातत्ववेत्ताओं की दलील है कि क़ब्र पर आने वाले सैलानियों के कारण गर्मी और आद्रता उत्पन्न होती है जिससे ममी पर बुरा असर पड़ सकता है, इसीलिए उनके अवशेषों को बाहर निकाला गया है.
मिस्र के पुरातत्व विभाग के प्रमुख ज़ही हवास का कहना था, "सुनहरे लड़के के जादू और उससे जुड़े रहस्य के बारे में हर कोई जानना चाहता है."
चर्चित राजा
तूतनख़ामेन को जितनी प्रसिद्धि अपने शासनकाल में नहीं मिली होगी उतनी मौत के बाद मिली जब 1922 में कार्टर ने उनकी ममी ढूंढ निकाली.
वैली ऑफ किंग्स में मिस्र के प्राचीन शासकों की ममी रखी गई हैं
उनके क़ब्र से सोने और हाथी दाँत से बने आभूषणों का जख़ीरा निकला. जब कार्टर की नज़र पहली बार उस पर गई तो उनकी प्रतिक्रिया थी, 'हाँ बहुत सुंदर चीजें हैं'.
ममी ने तावीज़ पहन रखा था और पूरा चेहरा सोने से बने मास्क से ढँका हुआ था.
इन सामानों को निकालने के लिए कार्टर और उनकी टीम के सदस्यों ने तूतनख़ामेन के शरीर के कई टुकड़े कर दिए. सोने के मास्क को हटाने के लिए गर्म छुरियों और तारों का इस्तेमाल किया गया.
इस मास्क को बाम की तरह तूतनख़ामेन के चेहरे पर चढ़ाया गया था.
विखंडित शरीर को दोबारा ठीक करने के बाद 1926 में उसे फिर से पुरानी जगह पर रख दिया गया. उसके बाद से ममी को एक्स-रे के लिए सिर्फ़ तीन बार बाहर निकाला गया है.
वर्ष 1968 में हुए एक्स-रे से ऐसा पता चला कि हड्डी का एक टुकड़ा उनकी खोपड़ी में धंसा हुआ है जिससे क़यास लगे कि 19 वर्षीय तूतनख़ामेन की मौत स्वाभाविक नहीं थी बल्कि उनकी हत्या की गई होगी.

सिंघापुर की अनोखी परंपरा

अनेकता में एकता की मिसाल भारतीय संस्कृति में कदम-कदम पर नजर आती है। यही कारण है कि उड़ीसा राज्य के सिंघापुर नामक स्थान पर ऐसी ही एक निराली परंपरा देखने को मिलती है। यहाँ एक ऐसा त्योहार मनाने का रिवाज है, जिसमें भगवान विष्णु की प्रतिमा को तालाब से निकालकर, उसकी यात्रा निकाली जाती है और पुनः उसे विसर्जित कर दिया जाता है। प्रत्येक वर्ष इसी तरह भगवान विष्णु की प्रतिमा को सिंघापुर तालाब से निकालकर उसे नगर में घुमाया जाता है, जो ‘सिंघापुर यात्रा’ के नाम से प्रचलित है। हर साल यह अप्रैल महीने में ही पणसँक्रान्ति त्योहार के दौरान मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि 16वीं सदी में एक राजा द्वारा भगवान विष्णु की प्रतिमा को मुस्लिम आक्रमणकारियों से बचाने के लिए तालाब में डाल दिया गया था। कुछ वर्षों पश्चात उसी राजा को स्वप्न में भगवान विष्णु के दर्शन हुए और उन्होंने उस प्रतिमा को तालाब से निकलवाकर उसकी पूजा करने का आदेश दिया और राजा ने उसका अनुसरण किया। तब से यह परंपरा चल पड़ी, जिसमें भगवान विष्णु की प्रतिमा को तालाब से निकालकर एक हफ्ते तक उसकी पूजा-अर्चना की जाती है और त्योहार के अंतिम दिन पुनः उसे तालाब में विसर्जित कर दिया जाता है।

अनोखा विवाह...

जोर-जोर से बजते ढोल-नगाड़े, नाचते-गाते लोग और बड़े पैमाने पर जलसा-समारोह। ऐसे मनाया गया एक विवाह समारोह, जिसमें दूल्हा-दुल्हन कोई पुरुष और महिला नहीं थे, बल्कि यह शादी थी - बरगद और पीपल के पेड़ की। हाल ही में उत्तराखंड के मेलाघाट खातिमा नामक एक छोटे-से गाँव में इन दोनों वृक्षों का भव्य पैमाने पर विवाह कराया गया। कई साल पहले बरगद के वृक्ष की एक शाखा पीपल के वृक्ष से लिपट गयी। गाँव वालों ने इस घटना को अंधविश्वास का रूप देते हुए, इन दोनों वृक्षों को पिछले जन्म के बिछड़े हुए प्रेमी-प्रेमिका मान लिया और धूम-धाम से इनका विवाह करवाया गया। तब से हर साल इन दोनों वृक्षों का विवाह कराने की परम्परा चली आ रही है।स्थानीय लोगों का मानना है कि ये विवाह संपन्न करवाने से उन्हें पुण्य की प्राप्ति होती है। ये दोनों वृक्ष पूरे गाँव की रक्षा करते हैं और गाँव को दैवी आपदाओं से बचाते हैं।यहाँ की निवासी शकुन्तला के अनुसार, बरगद और पीपल के विवाह के बारे में उन्होंने काफी कुछ सुन रखा था, लेकिन पहली बार उसे देख रही हैं। गाँव के सारे लोग इस समारोह में काफी उत्साह से भाग लेते हैं, क्योंकि यह गाँव की सुख-समृद्धि के लिए बहुत महत्पूर्ण है। इस अनोखे विवाह को पूरा गाँव वैदिक कर्मकाण्डों के अनुसार करवाता है। इस विवाह के दौरान पीपल के वृक्ष को दूल्हा और बरगद को दुल्हन माना जाता है। विवाह के दौरान इन दोनों वृक्षों को सफेद वस्त्रों से लपेटकर सजाया जाता है।दूर-दूर से हजारों लोग इस समारोह में भाग लेने के लिए आते हैं। सालों पुरानी यह परम्परा आज भी इस गाँव में बड़े धूम-धाम से मनायी जाती है।